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Political News: मोदी सरकार के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था पर नई स्टडी ने उठाए सवाल, Synthetic India से की गई तुलना

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | 2014 के बाद भारत की आर्थिक वृद्धि का Synthetic India से तुलना करने वाली स्टडी में शुरुआती बढ़त के बाद प्रति व्यक्ति आय के प्रदर्शन में अंतर की बात सामने आई है।

नई दिल्ली, 20 अगस्त। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के बाद भारत की आर्थिक और संस्थागत यात्रा को लेकर एक नई अकादमिक स्टडी चर्चा में है। शोध में यह देखने की कोशिश की गई है कि अगर 2014 में राजनीतिक बदलाव नहीं हुआ होता और भारत पहले जैसी आर्थिक राह पर आगे बढ़ता, तो प्रति व्यक्ति आय का प्रदर्शन कैसा रहता। इसके लिए शोधकर्ता ने वास्तविक भारत की तुलना एक काल्पनिक ‘Synthetic India’ से की है।

यह अध्ययन Jeet Saha ने किया है और इसमें ‘Synthetic Control Method’ का इस्तेमाल किया गया है। शोध का उद्देश्य 2014 के राजनीतिक बदलाव के आर्थिक प्रभाव का आकलन करना था। अध्ययन के मुताबिक, 2014 के बाद वास्तविक भारत की प्रति व्यक्ति आय में शुरुआत में Synthetic India की तुलना में बढ़त दिखाई दी, लेकिन यह फायदा लंबे समय तक कायम नहीं रहा। बाद के वर्षों में दोनों के बीच अंतर कम हुआ और अध्ययन अवधि के अंत तक Synthetic India की प्रति व्यक्ति आय वास्तविक भारत से अधिक हो गई। 

क्या है Synthetic India?

इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ‘Synthetic India’ की अवधारणा है। सामान्य तौर पर किसी देश की वास्तविक स्थिति की तुलना उसी देश के साथ उस स्थिति में करना संभव नहीं होता, जो राजनीतिक बदलाव नहीं होने पर होती।

ऐसे मामलों में शोधकर्ता कई समान देशों के आर्थिक आंकड़ों को एक विशेष सांख्यिकीय मॉडल के जरिए मिलाकर एक काल्पनिक तुलना तैयार करते हैं। इसे Synthetic Control Method कहा जाता है।

इस मॉडल के जरिए शोधकर्ता यह अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं कि 2014 के राजनीतिक बदलाव के बिना भारत की प्रति व्यक्ति आय किस दिशा में आगे बढ़ सकती थी।

अध्ययन में वास्तविक भारत और Synthetic India की आर्थिक राह की तुलना की गई। शोध के अनुसार 2014 के बाद शुरुआत में वास्तविक भारत का प्रदर्शन बेहतर रहा, लेकिन बाद के वर्षों में यह अंतर घटता गया। महामारी के दौरान वास्तविक भारत की प्रति व्यक्ति आय में Synthetic India की तुलना में अधिक गिरावट आई और अंत तक काल्पनिक मॉडल की प्रति व्यक्ति आय आगे निकल गई। 

10 फीसदी कम आय का दावा कितना सही?

इस विषय पर सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में यह दावा किया जा रहा है कि मोदी सरकार के दौरान भारत की प्रति व्यक्ति आय उस स्तर से करीब 10 फीसदी कम रही, जहां वह किसी वैकल्पिक परिस्थिति में पहुंच सकती थी।

हालांकि, इस आंकड़े को खबर में सीधे ‘मोदी सरकार ने 10 फीसदी आय घटा दी’ के रूप में पेश करना शोध की प्रकृति को सरल बनाना होगा। यह अंतर एक counterfactual model यानी काल्पनिक तुलना से निकाला गया अनुमान है, न कि वास्तविक रूप से हुई आय की कोई प्रत्यक्ष गणना।

इसलिए इसका अर्थ यह नहीं है कि हर भारतीय की आय वास्तविक रूप से 10 फीसदी कम कर दी गई। इसका अर्थ मॉडल के अनुसार वास्तविक भारत और वैकल्पिक Synthetic India के बीच अनुमानित अंतर से है।

शोध की पद्धति पर भी बहस संभव

ऐसी अकादमिक स्टडी के निष्कर्षों को समझते समय उसकी पद्धति को ध्यान में रखना जरूरी है। Synthetic Control Method में यह तय करना महत्वपूर्ण होता है कि किन देशों को तुलना के लिए चुना गया और उन्हें कितना वजन दिया गया।

इस वजह से किसी भी Synthetic India मॉडल को भारत का वास्तविक वैकल्पिक इतिहास नहीं माना जा सकता। यह एक सांख्यिकीय counterfactual है, जिसके आधार पर संभावित परिणामों का अनुमान लगाया जाता है।

इसीलिए स्टडी के निष्कर्षों को सरकार के आर्थिक प्रदर्शन पर अंतिम फैसला मानने के बजाय एक शोध-आधारित आकलन के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।

शुरुआती दौर में भारत की स्थिति बेहतर क्यों दिखी?

शोध के अनुसार 2014 के राजनीतिक बदलाव के बाद वास्तविक भारत की प्रति व्यक्ति आय ने शुरुआती वर्षों में Synthetic India की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया। यानी अध्ययन यह नहीं कहता कि मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल में भारत लगातार वैकल्पिक मॉडल से पीछे रहा।

समय के साथ तस्वीर बदली। बाद के वर्षों में अंतर कम हुआ और कोविड-19 महामारी के दौरान वास्तविक भारत की प्रति व्यक्ति आय को बड़ा झटका लगा। अध्ययन अवधि के अंत तक Synthetic India की प्रति व्यक्ति आय वास्तविक भारत से ऊपर निकल गई। 

आर्थिक प्रदर्शन को लेकर राजनीतिक बहस तेज

इस स्टडी के सामने आने के बाद भारत की आर्थिक नीतियों को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हो सकती है। सरकार के समर्थक भारत की तेज आर्थिक वृद्धि, बड़े बुनियादी ढांचे और वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ती भूमिका को उपलब्धि के तौर पर देखते हैं।

वहीं आलोचक रोजगार, प्रति व्यक्ति आय, निजी निवेश और घरेलू मांग जैसे मुद्दों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।

ऐसे में किसी एक अध्ययन के आधार पर पूरी अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा। GDP वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय, रोजगार, निवेश, महंगाई और उत्पादकता जैसे कई संकेतकों को एक साथ देखना जरूरी है।

संस्थाओं को लेकर अलग बहस

सोशल मीडिया पर इस आर्थिक स्टडी को लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति से जोड़कर भी पेश किया जा रहा है। लेकिन आर्थिक प्रदर्शन और संस्थागत गुणवत्ता के सवालों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

संस्थाओं से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों की अपनी पद्धतियां और सीमाएं होती हैं। इसलिए किसी इंडेक्स में गिरावट को अपने आप किसी एक सरकार की नीतियों का प्रत्यक्ष कारण मानना सावधानी के बिना उचित नहीं होगा।

क्या स्टडी मोदी सरकार की नीतियों को विफल साबित करती है?

सीधे तौर पर ऐसा कहना इस शोध की सीमा से आगे निकल जाना होगा।

अध्ययन 2014 के राजनीतिक बदलाव और उसके बाद प्रति व्यक्ति आय की वास्तविक तथा Synthetic India के बीच तुलना करता है। इसका निष्कर्ष यह है कि शुरुआती आर्थिक लाभ बाद में कायम नहीं रहा और अध्ययन अवधि के अंत तक वैकल्पिक मॉडल आगे निकल गया। 

इसका मतलब यह नहीं कि भारत की पूरी अर्थव्यवस्था विफल रही या देश की सारी आर्थिक उपलब्धियां समाप्त हो गईं। बल्कि यह शोध इस सवाल को सामने रखता है कि क्या भारत 2014 के बाद उपलब्ध संभावित आर्थिक रास्ते से बेहतर प्रदर्शन कर सकता था?

निष्कर्ष

मोदी सरकार के आर्थिक प्रदर्शन पर बहस आने वाले समय में भी जारी रहने की संभावना है। नई स्टडी ने इस बहस को एक अलग सांख्यिकीय नजरिया दिया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शोध वास्तविक भारत की तुलना एक काल्पनिक Synthetic India से करता है। अध्ययन के मुताबिक 2014 के बाद वास्तविक भारत को शुरुआत में बढ़त मिली, लेकिन समय के साथ यह लाभ कमजोर हुआ और अध्ययन अवधि के अंत में Synthetic India की प्रति व्यक्ति आय अधिक रही। 

इसलिए इस अध्ययन को सरकार के पक्ष या विपक्ष में अंतिम प्रमाण के तौर पर देखने के बजाय भारत की आर्थिक दिशा पर एक अकादमिक विश्लेषण के रूप में पढ़ना ज्यादा उचित होगा।

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